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जब-जब किसी समाज, व्यक्ति, प्रकृति या स्थान का उसकी पूरी गरिमा के साथ हमारे समय में होना असम्भव हुआ है, आलोकधन्वा की कविताओं ने उसे अपनी परिधि में संभव किया है। निर्वासित और नष्ट होती स्थितियों की पुनर्रचना जितनी सहज और प्राकृतिक आभा के साथ उनकी कविताओं में होती है वह बहुत आम नहीं है। उनके लिए कविता हर कहीं मौजूद है, पानी में, ओस में, बच्चे में, गायकों में, योद्धाओं में, औरतों और पेड़ों में।

'मुलाक़ातें' उनका दूसरा कविता-संग्रह है जो बहुत लम्बी प्रतीक्षा के बाद आ रहा है। इस संग्रह में शामिल कविताएँ प्रकृति, जीवन, जन- गण और संसार के प्रति उनके उच्छल प्रेम को और भी पारदर्शिता के साथ व्यक्त करती हैं, और समय के प्रति उनकी असहमतियों और आलोचना-भाव को भी।

उनकी कविता एक बड़ी हद तक अन्धविश्वासी और आत्मघाती होते समाज में निर्वासन झेलती वैज्ञानिक विचारधारा की पुनर्रचना है। देश और समाज उनके लिए सिर्फ विचार नहीं ठोस और छूकर महसूस की जानेवाली जीवंत इकाइयाँ हैं, तभी वे फाँसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए शहीदों के सरोकारों को भी अनुभूत कर पातें हैं और अलग-अलग भाषाओं में बोलती, क्रूरताओं के सामन्ती गढ़ों को तोड़कर बढ़ी आती आज की युवा शक्ति में 'कुछ ज्यादा भारत' को भी चीन्ह पाते हैं। देश का बँटवारा उन्हें आज भी सालता है। कहते हैं-" अगर भारत का विभाजन/नहीं होता/तो हम बेहतर कवि होते/बार-बार बारूद से झुलसते/कत्लगाहों को पार करते हुए/हम विडम्बनाओं के कवि बनकर रह गए।"

हिन्दी कविता को प्रेम करनेवाले पाठकों के लिए अपने प्रिय कवि का यह संग्रह निश्चय ही एक सुखद घटना साबित होगा।

Mulaqatein | मुलाक़ातें

SKU: 9788119159307
₹199.00 नियमित मूल्य
₹179.10बिक्री मूल्य
मात्रा
स्टाक खत्म
  • Author

    Alokdhanva

  • Publisher

    Rajkamal Prakashan

  • No. of Pages

    112

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